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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँकुलिस कठोरु॥१५३॥
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँकुलिस कठोरु॥१५३॥
राजाके रावले (रनिवास) में [रोनेका] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम
मच गया! [ऐसा जान पड़ता था] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वज्र
गिरा हो। १५३।।
प्रान कंठगत भयउ भुआलू।
मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥
इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी।
जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥
मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥
इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी।
जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥
राजाके प्राण कण्ठमें आ गये। मानो मणिके बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया
हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जलके तालाबमें कमलोंका वन
मुरझा गया हो॥१॥
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना।
रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥
उर धरि धीर राम महतारी।
बोली बचन समय अनुसारी॥
रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥
उर धरि धीर राम महतारी।
बोली बचन समय अनुसारी॥
कौसल्याजीने राजाको बहुत दु:खी देखकर अपने हृदयमें जान लिया कि अब सूर्यकुलका
सूर्य अस्त हो चला! तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्या हृदयमें धीरज धरकर समयके
अनुकूल वचन बोलीं-॥२॥
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू।
राम बियोग पयोधि अपारू।
करनधार तुम्ह अवध जहाजू।
चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥
राम बियोग पयोधि अपारू।
करनधार तुम्ह अवध जहाजू।
चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥
हे नाथ! आप मनमें समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्रका वियोग अपार समुद्र है।
अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और
प्रजा) ही यात्रियोंका समाज है, जो इस जहाजपर चढ़ा हुआ है॥३॥
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू।
नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी।
रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥
नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी।
रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥
आप धीरज धरियेगा, तो सब पार पहुँच जायँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे
प्रिय स्वामी ! यदि मेरी विनती हृदयमें धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण,
सीता फिर आ मिलेंगे॥ ४॥
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