रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०-मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥१६४॥


भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं॥ १६४।।

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए।
अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई।
सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥


सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया, मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है॥१॥

देखि सुभाउ कहत सबु कोई।
राम मातु अस काहे न होई॥
माताँ भरतु गोद बैठारे।
आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे।


कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं- श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं-॥२॥

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू।
कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥
जनि मानहु हियँ हानि गलानी।
काल करम गति अघटित जानी।


हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो॥३॥

काहुहि दोसु देहु जनि ताता।
भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा।
अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥


हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दु:खपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है?॥ ४॥
 

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