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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥१६५॥
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥१६५॥
हे तात! पिताकी आज्ञा से श्रीरघुवीर ने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और वल्कल-वस्त्र
पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष!॥१६५॥
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू।
सब कर सब बिधि करि परितोषू॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी।
रहइ न राम चरन अनुरागी॥
सब कर सब बिधि करि परितोषू॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी।
रहइ न राम चरन अनुरागी॥
उनका मुख प्रसन्न था; मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सबका सब तरहसे सन्तोष
कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणोंकी
अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं॥१॥
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा।
रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई।
चले संग सिय अरु लघु भाई॥
रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई।
चले संग सिय अरु लघु भाई॥
सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न
किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मण
को साथ लेकर चले गये॥२॥
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए।
गइउँ न संग न प्रान पठाए।
यह सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें।
तउ न तजा तनु जीव अभागें।
गइउँ न संग न प्रान पठाए।
यह सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें।
तउ न तजा तनु जीव अभागें।
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने
प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखों के सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने
शरीर नहीं छोड़ा॥३॥
मोहि न लाज निज नेहु निहारी।
राम सरिस सुत मैं महतारी॥
जिऐ मरै भल भूपति जाना।
मोर हृदय सत कुलिस समाना।
राम सरिस सुत मैं महतारी॥
जिऐ मरै भल भूपति जाना।
मोर हृदय सत कुलिस समाना।
अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्र की मैं माता!
जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रों के समान कठोर
है॥४॥
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