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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-- कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥१७३॥
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥१७३॥
हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और
शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं? ॥१७३॥
सब प्रकार भूपति बड़भागी।
बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।
यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू।
सिर धरि राज रजायसु करहू॥
बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।
यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू।
सिर धरि राज रजायसु करहू॥
राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर
सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो॥१॥
रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा।
पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी।
तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥
पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी।
तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥
राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने
वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी
आहुति दे दी।॥ २॥
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना।
करहु तात पितु बचन प्रवाना॥
करहु सीस धरि भूप रजाई।
हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।
करहु तात पितु बचन प्रवाना॥
करहु सीस धरि भूप रजाई।
हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।
राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको
प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह
भलाई है ॥३॥
परसुराम पितु अग्या राखी।
मारी मातु लोक सब साखी।
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ।
पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥
मारी मातु लोक सब साखी।
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ।
पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥
परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं।
राजा ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे
उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ॥४॥
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