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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥१७४॥
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥१७४॥
जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख
और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग) में निवास करते हैं ॥१७४॥
अवसि नरेस बचन फुर करहू।
पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥
सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू।
तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥
पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥
सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू।
तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥
राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे
स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं
लगेगा ॥१॥
बेद बिदित संमत सबही का।
जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥
करहु राजु परिहरहु गलानी।
मानहु मोर बचन हित जानी॥
जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥
करहु राजु परिहरहु गलानी।
मानहु मोर बचन हित जानी॥
यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है
कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग
कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो॥२॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं।
अनुचित कहब न पंडित केहीं॥
कौसल्यादि सकल महतारीं।
तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारी।
अनुचित कहब न पंडित केहीं॥
कौसल्यादि सकल महतारीं।
तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारी।
इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे
अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी
होंगी॥३॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि।
सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।
सौंपेहु राजु राम के आएँ।
सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।
सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।
सौंपेहु राजु राम के आएँ।
सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।
जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे
तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और
सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना॥४॥
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