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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
ससि गुर तिय गामी नधुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥२२८॥
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥२२८॥
चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा। और राजा वेन
के समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनों से विमुख हो गया।॥ २२८॥
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू।
केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ।
रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥
केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ।
रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥
सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमद ने कलङ्क नहीं दिया?
भरतने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋण को कभी जरा भी शेष नहीं
रखना चाहिये ॥१॥
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई।
निदरे रामु जानि असहाई॥
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी।
समर सरोष राम मुखु पेखी।
निदरे रामु जानि असहाई॥
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी।
समर सरोष राम मुखु पेखी।
हाँ, भरत ने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी (आप) को असहाय जानकर उनका निरादर
किया! पर आज संग्राम में श्रीरामजी (आप) का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी
उनकी समझ में विशेषरूप से आ जायगी (अर्थात् इस निरादरका फल भी वे अच्छी तरह पा
जायँगे) ॥ २॥
एतना कहत नीति रस भूला।
रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।
रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।
इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष पुलकावली के बहाने
से फूल उठा (अर्थात् नीति की बात कहते-कहते उनके शरीर में वीर-रस छा गया)। वे
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की वन्दना करके, चरण-रज को सिरपर रखकर सच्चा और
स्वाभाविक बल कहते हुए बोले॥३॥
अनुचित नाथ न मानब मोरा।
भरत हमहि उपचार न थोरा॥
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें।
नाथ साथ धनु हाथ हमारें।
भरत हमहि उपचार न थोरा॥
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें।
नाथ साथ धनु हाथ हमारें।
हे नाथ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने हमें कम नहीं प्रचारा है (हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है)। आखिर कहाँ तक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है!॥४॥
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