रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
आईएसबीएन :

Like this Hindi book 0

भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥२२९॥


क्षत्रिय जाति, रघुकुलमें जन्म और फिर मैं श्रीरामजी (आप) का अनुगामी (सेवक) हूँ, यह जगत् जानता है। [फिर भला कैसे सहा जाय?] धूल के समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारने पर सिर ही चढ़ती है ॥ २२९ ॥

उठि कर जोरि रजायसु मागा।
मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा।
साजि सरासनु सायकु हाथा॥


यों कहकर लक्ष्मणजीने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी। मानो वीररस सोतेसे जाग उठा हो। सिरपर जटा बाँधकर कमरमें तरकस कस लिया और धनुषको सजकर तथा बाण को हाथमें लेकर कहा-- ॥१॥

आजु राम सेवक जसु लेऊँ।
भरतहि समर सिखावन देऊँ॥
राम निरादर कर फलु पाई।
सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥


आज मैं श्रीराम (आप) का सेवक होनेका यश लूँ और भरतको संग्राममें शिक्षा दूं। श्रीरामचन्द्रजी (आप) के निरादरका फल पाकर दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) रण-शय्यापर सोवें!॥२॥

आइ बना भल सकल समाजू।
प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू।
लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥


अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचल डालता है और बाज जैसे लवेको लपेटमें ले लेता है॥३॥

तैसेहिं भरतहि सेन समेता।
सानुज निदरि निपातउँ खेता॥
जौं सहाय कर संकरु आई।
तौ मारउँ रन राम दोहाई॥


वैसे ही भरत को सेनासमेत और छोटे भाई सहित तिरस्कार करके मैदानमें पछाडूँगा। यदि शङ्करजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजी की सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्धमें [अवश्य] मार डालूँगा (छोडूंगा नहीं)॥४॥

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book