|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥२३७॥
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥२३७॥
जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनियोंके वृन्दसमेत बैठकर नित्य शास्त्र, वेद और
पुराणोंके सब कथा-इतिहास सुनते हैं।। २३७॥
सखा बचन सुनि बिटप निहारी।
उमगे भरत बिलोचन बारी।।
करत प्रनाम चले दोउ भाई।
कहत प्रीति सारद सकुचाई॥
उमगे भरत बिलोचन बारी।।
करत प्रनाम चले दोउ भाई।
कहत प्रीति सारद सकुचाई॥
सखाके वचन सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतजीके नेत्रोंमें जल उमड़ आया। दोनों भाई
प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेमका वर्णन करनेमें सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं ॥ १
॥
हरषहिं निरखि राम पद अंका।
मानहुँ पारसु पायउ रंका॥
स्ज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं।
रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥
मानहुँ पारसु पायउ रंका॥
स्ज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं।
रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥
श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र
पारस पा गया हो। वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हृदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और
श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं ॥ २ ॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






