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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका सत्कार
देखि भरत गति अकथ अतीवा।
प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥
सखहि सनेह बिबस मग भूला।
कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥
प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥
सखहि सनेह बिबस मग भूला।
कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥
भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड (वृक्षादि) जीव
प्रेममें मग्न हो गये। प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल
गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे॥३॥
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे।
सहज सनेहु सराहन लागे।
होत न भूतल भाउ भरत को।
अचर सचर चर अचर करत को।
सहज सनेहु सराहन लागे।
होत न भूतल भाउ भरत को।
अचर सचर चर अचर करत को।
भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके
स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [अथवा
प्रेम] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता?॥४॥
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