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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गंभीर।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥२३८॥
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥२३८॥
प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपाके समुद्र
श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे
समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है ॥
२३८ ॥
सखा समेत मनोहर जोटा।
लखेउ न लखन सघन बन ओटा।
भरत दीख प्रभु आश्रम पावन।
सकल सुमंगल सदनु सुहावन।
लखेउ न लखन सघन बन ओटा।
भरत दीख प्रभु आश्रम पावन।
सकल सुमंगल सदनु सुहावन।
सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन वनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख
पाये। भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमङ्गलोंके धाम और सुन्दर पवित्र
आश्रमको देखा ॥१॥
करत प्रबेस मिटे दुख दावा।
जनु जोगीं परमारथु पावा॥
देखे भरत लखन प्रभु आगे।
पूँछे बचन कहत अनुरागे॥
जनु जोगीं परमारथु पावा॥
देखे भरत लखन प्रभु आगे।
पूँछे बचन कहत अनुरागे॥
आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दुःख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगीको
परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके
आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बातका
प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं)॥२॥
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधे।
तून कसे कर सरु धनु काँधे।
बेदी पर मुनि साधु समाजू।
सीय सहित राजत रघुराजू॥
तून कसे कर सरु धनु काँधे।
बेदी पर मुनि साधु समाजू।
सीय सहित राजत रघुराजू॥
सिरपर जटा है। कमरमें मुनियोंका (वल्कल) वस्त्र बाँधे हैं और उसीमें तरकस कसे
हैं। हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है। वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है
और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं ॥ ३॥
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा।
जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा॥
कर कमलनि धनु सायकु फेरत।
जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥
जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा॥
कर कमलनि धनु सायकु फेरत।
जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥
श्रीरामजीके वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है। [सीतारामजी
ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने
करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं
(अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति
मिल जाती है।) ॥४॥
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