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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु॥२३९ ॥
ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु॥२३९ ॥
सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे
सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर
धारण करके विराजमान हैं।।२३९॥
सानुज सखा समेत मगन मन।
बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं।
भूतल परे लकुट की नाईं।
बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं।
भूतल परे लकुट की नाईं।
छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [प्रेममें] मग्न हो रहा है।
हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। 'हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं ! रक्षा
कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े॥१॥
बचन सपेम लखन पहिचाने।
करत प्रनामु भरत जियँ जाने।
बंधु सनेह सरस एहि ओरा।
उत साहिब सेवा बस जोरा॥
करत प्रनामु भरत जियँ जाने।
बंधु सनेह सरस एहि ओरा।
उत साहिब सेवा बस जोरा॥
प्रेमभरे वचनों से लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम
कर रहे हैं। [वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे
उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजी का सरस प्रेम और उधर स्वामी
श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता॥२॥
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई।
सुकबि लखन मन की गति भनई॥
रहे राखि सेवा पर भारू।
चढ़ी चंग जनु बैंच खेलारू॥
सुकबि लखन मन की गति भनई॥
रहे राखि सेवा पर भारू।
चढ़ी चंग जनु बैंच खेलारू॥
न तो [क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक् होकर ] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश]
छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति
(दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये (सेवाको ही विशेष
महत्त्वपूर्ण समझकर उसी में लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी (पतंग
उड़ानेवाला) खींच रहा हो॥३॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा।
भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥
उठे रामु सुनि पेम अधीरा।
कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥
भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥
उठे रामु सुनि पेम अधीरा।
कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥
लक्ष्मणजी ने प्रेमसहित पृथ्वी पर मस्तक नवाकर कहा-हे रघुनाथजी ! भरतजी प्रणाम
कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र
गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ॥ ४॥
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