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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥२४०॥
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥२४०॥
कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया! भरतजी और
श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी॥ २४०॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी।
कबिकुल अगम करम मन बानी॥
परम पेम पूरन दोउ भाई।
मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥
कबिकुल अगम करम मन बानी॥
परम पेम पूरन दोउ भाई।
मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥
मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनों से
अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारको भुलाकर
परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ॥१॥
कहहु सुपेम प्रगट को करई।
केहि छाया कबि मति अनुसरई॥
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा।
अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥
केहि छाया कबि मति अनुसरई॥
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा।
अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥
कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेमको कौन प्रकट करे? कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण
करे? कविको तो अक्षर और अर्थका ही सच्चा बल है। नट तालकी गतिके अनुसार ही नाचता
है! ॥२॥
अगम सनेह भरत रघुबर को।
जहँ न जाइ मनु बिधि हरिहर को।
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती।
बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥
जहँ न जाइ मनु बिधि हरिहर को।
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती।
बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥
भरतजी और श्रीरघुनाथजीका प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका भी
मन नहीं जा सकता। उस प्रेमको मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडरकी
ताँतसे भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? ॥ ३ ॥
[तालाबों और झीलोंमें एक तरहकी घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की।
सुरगन सभय धकधकी धरकी॥
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे।
बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥
सुरगन सभय धकधकी धरकी॥
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे।
बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके मिलनेका ढंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी
धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजीने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और
फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे॥४॥
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