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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥२८२॥
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥२८२॥
कौसल्याजीने दुःखभरे हृदयसे कहा-श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जायँ, इसका
परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरतकी चिन्ता है॥२८२ ॥
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी।
सुत सुतबधू देवसरि बारी॥
राम सपथ मैं कोन्हि न काऊ।
सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥
सुत सुतबधू देवसरि बारी॥
राम सपथ मैं कोन्हि न काऊ।
सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥
ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ
गङ्गाजीके जलके समान पवित्र हैं। हे सखी! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की,
सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ- ॥१॥
भरत सील गुन बिनय बड़ाई।
भायप भगति भरोस भलाई।
कहत सारदहु कर मति हीचे।
सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥
भायप भगति भरोस भलाई।
कहत सारदहु कर मति हीचे।
सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥
भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करने
में सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है। सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं ?
॥२॥
जानउँ सदा भरत कुलदीपा।
बार बार मोहि कहेउ महीपा॥
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ।
पुरुष परिखिअहिं समय सुभाएँ।
बार बार मोहि कहेउ महीपा॥
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ।
पुरुष परिखिअहिं समय सुभाएँ।
मैं भरत को सदा कुल का दीपक जानती हूँ। महाराज ने भी बार-बार मुझे यही कहा था।
सोना कसौटी पर कसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलने पर ही पहचाना जाता
है। वैसे ही पुरुष की परीक्षा समय पड़ने पर उसके स्वभाव से ही (उसका चरित्र
देखकर) हो जाती है ॥३॥
अनुचित आजु कहब अस मोरा।
सोक सनेहँ सयानप थोरा।
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी।
भईं सनेह बिकल सब रानी॥
सोक सनेहँ सयानप थोरा।
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी।
भईं सनेह बिकल सब रानी॥
किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेहमें सयानापन (विवेक) कम हो
जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजीकी
गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो
उठीं।। ४ ॥
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