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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ॥२८३॥
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ॥२८३॥
कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा-हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार
श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है? ॥ २८३॥
रानि राय सन अवसरु पाई।
अपनी भाँति कहब समुझाई॥
रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन।
जौं यह मत मानै महीप मन॥
अपनी भाँति कहब समुझाई॥
रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन।
जौं यह मत मानै महीप मन॥
हे रानी! मौका पाकर आप राजाको अपनी ओरसे जहाँतक हो सके समझाकर कहियेगा कि
लक्ष्मणको घर रख लिया जाय और भरत वनको जायँ। यदि यह राय राजाके मनमें [ठीक] अँच
जाय, ॥१॥
तौ भल जतनु करब सुबिचारी।
मोरें सोचु भरत कर भारी॥
गूढ़ सनेह भरत मन माहीं।
रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥
मोरें सोचु भरत कर भारी॥
गूढ़ सनेह भरत मन माहीं।
रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥
तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरतका अत्यधिक सोच है। भरतके
मनमें गढ प्रेम है। उनके घर रहने में मझे भलाई नहीं जान पडती (यह डर लगता है कि
उनके प्राणोंको कोई भय न हो जाय) ॥२॥
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी।
सब भइ मगन करुन रस रानी॥
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि।
सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥
सब भइ मगन करुन रस रानी॥
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि।
सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणीको सुनकर सब रानियाँ
करुणरसमें निमग्न हो गयीं। आकाशसे पुष्पवर्षाकी झड़ी लग गयी और धन्य-धन्यकी
ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेहसे शिथिल हो गये॥३॥
सब रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ।
तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती।
राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥
तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती।
राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥
सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजीने धीरज धरके
कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी
प्रेमपूर्वक उठीं- ॥४॥
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