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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥२८९॥
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥२८९॥
राजाने बिलखकर (प्रेमसे गद्गद होकर) कहा- भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजीकी
आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे। अतः स्नेहके वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥
२८९ ॥
राम भरत गुन गनत सप्रीती।
निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥
राज समाज प्रात जुग जागे।
न्हाइ हाइ सुर पूजन लागे॥
निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥
राज समाज प्रात जुग जागे।
न्हाइ हाइ सुर पूजन लागे॥
श्रीरामजी और भरतजीके गुणोंकी प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति पत्नीको
रात पलकके समान बीत गयी। प्रात:काल दोनों राजसमाज जागे और नहा नहाकर देवताओंकी
पूजा करने लगे ॥१॥
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई।
बंदि चरन बोले रुख पाई॥
नाथ भरतु पुरजन महतारी।
सोक बिकल बनबास दुखारी॥
बंदि चरन बोले रुख पाई॥
नाथ भरतु पुरजन महतारी।
सोक बिकल बनबास दुखारी॥
श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका
रुख पाकर बोले-हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोकसे व्याकुल और
वनवाससे दु:खी हैं ॥ २ ॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू।
बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा।
हित सबही कर रौरें हाथा॥
बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा।
हित सबही कर रौरें हाथा॥
मिथिलापति राजा जनकजी को भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये। इसलिये हे
नाथ! जो उचित हो वही कीजिये। आपहीके हाथ सभीका हित है ॥ ३ ॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ।
मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा।
नरक सरिस दुहु राज समाजा॥
मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा।
नरक सरिस दुहु राज समाजा॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [प्रेम और
आनन्दसे] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये। [उन्होंने खुलकर कहा-] हे राम! तुम्हारे
बिना [घर-बार आदि] सम्पूर्ण सुखों के साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान
हैं॥४॥
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