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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- खग मृग परिजन नगरु बनु, बलकल बिमल दुकूल।
नाथ साथ सुरसदन सम, परनसाल सुख मूल॥६५॥
नाथ साथ सुरसदन सम, परनसाल सुख मूल॥६५॥
बनदेबी बनदेव उदारा।
करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥
कुस किसलय साथरी सुहाई।
प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥
करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥
कुस किसलय साथरी सुहाई।
प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥
कंद मूल फल अमिअ अहारू।
अवध सौध सत सरिस पहारू॥
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी।
रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥
अवध सौध सत सरिस पहारू॥
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी।
रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे।
भय बिषाद परिताप घनेरे॥
प्रभु बियोग लवलेस समाना।
सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥
भय बिषाद परिताप घनेरे॥
प्रभु बियोग लवलेस समाना।
सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥






